સાંપ્રત પ્રવાહો
सन की पिटाई

सन की पिटाई

विषय देख कर कुछ बंधु सोच में पड़ गए होंगे की शायद हम पुत्र (सन) को पीटने के विषय में कुछ लिख रहे हैं , पर घबराएँ नहीं क्योंकि यहाँ कथा कुछ और ही है|
बहुत बार जब शहर के माहौल से ऊब सी हो जाती है और घुटन महसूस होने लगती है तो हम अपने अभिन्न मित्र – “खानाबदोश” ( अपनी बुलेट मोटरसाइकिल को हमने ये नाम दे रखा है) के साथ गाँव की ओर निकल पड़ते हैं | बचपन की कुछ यादें “साक्षात” खोजने … ऐसे ही आज देहात की तरफ बढ़ चले तो एक जगह एक लड़के व् एक वृद्ध पुरुष को “सन” पीटते हुए पाया , स्वयं को रोक न सके और उनकी ओर बढ़ लिए| पूछने पर पता चला की लड़का उनका नाती था!! अच्छा लगा की कुछ पुरानी विधियां आज भी अपनी अगली पुश्तों को बताई जा रही हैं |

हमें याद हैं की छोटे थे तो हम देखते सुग्रीम चचा (जी हाँ , सुग्रीम .. सुग्रीव नही) बारी (बाग) जाने वाले रस्ते में जो तालाब था वहाँ सन के बड़े बड़े गट्ठर बनाकर उसे दलदल से ढक देते थे , कुछ दिनों बाद जब वह सड़ जाता था तो उसे वही गढ़ही में पीटा जाता था जैसे की यहाँ पोस्ट चित्रों में आप देख सकते हैं| इतना पीटा जाता है की आपको दया आ जायेगी !! मार खा खा के ये फिर रेशों में बदल जाते हैं जिसकी – बाध , सुतरी (सुतली) इत्यादि बनाई जाती है| इस प्रक्रिया को यदि कोई पहली बार देखेगा तो उसे विरक्ति हो जायेगी दुर्गन्ध से व् अगर “सतही ग्राम प्रेमी” हुआ तो वह चलता बनेगा !!

खैर … बहुत तरक्की हो गयी है और अब बाजार में कई तरह की सिंथेटिक रस्सियाँ आ गयीं हैं पर बाध की बीनी हुई खटिया पर जो नींद आती है वो सिंथेटिक रस्सी वाली खटिया में कहाँ | और बाध की रस्सी या सुतरी को भिंगा कर बाँध दें तो मजाल है की कोई उसे खोल ले |
ऐसे ही कुछ बीता था हमारा बचपन , बाध की बीनी हुई खटिया पर दोपहर को मंड़ई में व् रात को इनारे (कुएँ) पर सोना| तब नहीं समझ पाए पर अब समझ आता है की शानदार डबल बेडों पर वो नींद नहीं आ सकती जो उन दिनों आती थी| खटिया जब ज्यादा ही झूल जाती थी तब उसे कसना भी एक अलग आनंददायी प्रक्रिया होती थी और नींद मेहनत से कमाई हुई लगती थी| खटिया को धूप में डालना और सोने के समय वर्षा होने पर उसे लेकर भागना आज भी बरबस ही होठों पर मुस्कान ला देता है|
खैर कुछ देर हम वहाँ रुके , उनसे वार्तालाप किया , इच्छा थी की हम भी उतर जाएँ मैदान में और थोड़ा “रियाज़” करें , पर शायद आयु ने सिखा दिया है की इच्छा को कई बार दबाना भी पड़ता है| अतः बाबाजी से विदा मांगी व् उन्हें धन्यवाद दिया की उस “कला” को उन्होंने बचा रखा है और बालक को आशीष देते हुए हम भाई खानाबदोश के साथ अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चले ……….

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